अल्मोड़ा/नैनीताल। अल्मोड़ा के चर्चित ऊंट प्रकरण ने अब कानूनी और संवैधानिक बहस का रूप ले लिया है। ऊंट स्वामी शाहिद अंसारी द्वारा उत्तराखंड उच्च न्यायालय में दायर आपराधिक रिट याचिका में न केवल एफआईआर संख्या 63/2026 को चुनौती दी गई है, बल्कि पूरे प्रशासनिक घटनाक्रम की न्यायिक समीक्षा की मांग भी की गई है।
याचिका अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर जोशी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेश सिंह बिष्ट के सहयोग से प्रस्तुत की। इसमें राज्य सरकार, पशुपालन विभाग, जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, उप जिलाधिकारी, कोतवाली पुलिस, विवेचक, संबंधित एनजीओ तथा शिकायतकर्ता महिला को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रशासन ने बिना निष्पक्ष जांच पूरी किए दोनों ऊंटों को अपने कब्जे में लेकर निजी संस्था को सौंप दिया। याचिका में दावा किया गया है कि सरकारी पशु चिकित्साधिकारी की रिपोर्ट में ऊंट स्वस्थ पाए गए थे, इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई तथ्यों और विधिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।
याचिका में यह भी कहा गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा 23 जून को एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर अथवा अंगूठा निशान लिए जाने के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया, जिसके आधार पर आगे एफआईआर दर्ज हुई। याचिकाकर्ता ने इस संपूर्ण प्रक्रिया की वैधानिकता पर प्रश्न उठाते हुए निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण की मांग की है।
याचिका में 28 जून की घटना का भी उल्लेख है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि जिला प्रशासन ने ज्ञापन स्वीकार नहीं किया तथा अधिवक्ता के साथ कथित रूप से अनुचित व्यवहार किया गया। इन तथ्यों को भी न्यायालय के समक्ष रखा गया है।
याचिका का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधार Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 की धारा 29 को बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सक्षम न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि से पूर्व पशुओं की अभिरक्षा छीनना कानून की भावना के विपरीत है।
याचिका में एफआईआर निरस्त करने, ऊंटों की अंतरिम अभिरक्षा वापस दिलाने और किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई है।
अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ने कहा कि यह मामला कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की परीक्षा का विषय है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग विधि की सीमाओं से बाहर जाकर किया गया है तो न्यायालय से हस्तक्षेप अपेक्षित है।
अब पूरा मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय के विचाराधीन रहेगा। न्यायालय के आदेश के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रशासनिक कार्रवाई, पुलिस जांच और पशुओं की अभिरक्षा से जुड़े निर्णय कानून की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं। फिलहाल सभी पक्षों की दलीलों पर न्यायालय में सुनवाई होना शेष है।




