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टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों ने खोला मोर्चा, प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग

भावना मल्होत्रा
Last updated: May 13, 2026 4:16 am
भावना मल्होत्रा
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Teachers open front against TET mandatory, demand intervention from the Prime Minister
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अल्मोड़ा। विकासखंड हवालबाग जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ ने सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) अनिवार्य किए जाने के निर्णय के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा है। संघ ने मांग की है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1 सितंबर 2025 को दिए गए निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए और लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत प्रदान की जाए।

शिक्षक संघ के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि प्रारंभिक शिक्षकों को सेवा में बने रहने और पदोन्नति प्राप्त करने के लिए 55 वर्ष तक टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। साथ ही दो वर्षों के भीतर परीक्षा पास नहीं करने वाले शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने का भी प्रावधान बताया गया है। इस निर्णय के बाद उत्तराखंड सहित देशभर के हजारों शिक्षक मानसिक दबाव और असमंजस की स्थिति में हैं।

संघ का कहना है कि उत्तराखंड में वर्ष 2011 से प्रारंभिक शिक्षक भर्ती में टीईटी अनिवार्य किया गया था। इससे पहले नियुक्त शिक्षकों की भर्ती अलग शैक्षणिक और प्रशिक्षण मानकों के आधार पर हुई थी। उस समय बीटीसी, सीपीएड, बीएड और बीपीएड जैसी प्रशिक्षण योग्यताओं के आधार पर शिक्षक नियुक्त किए गए थे। जबकि बाद में लागू नियमों के तहत टीईटी के लिए स्नातक में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक तथा आयु सीमा 40 वर्ष निर्धारित कर दी गई।

शिक्षकों का कहना है कि वर्तमान में जिन शिक्षकों को टीईटी उत्तीर्ण करने के निर्देश दिए जा रहे हैं, उनकी आयु 40 से 55 वर्ष के बीच है। इस आयु में नियमित शैक्षणिक कार्यों के साथ टीईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षा पास करना अत्यंत कठिन है। उन्होंने कहा कि शिक्षक पहले से ही पठन-पाठन के अलावा विभागीय सर्वे, चुनाव ड्यूटी, जनगणना, पोषण अभियान, आपदा प्रबंधन और अन्य सरकारी कार्यों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में दो वर्षों के भीतर परीक्षा उत्तीर्ण करने की शर्त व्यवहारिक नहीं है।

ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2017 में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा सेवारत शिक्षकों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन राज्य सरकार और शिक्षा विभाग ने समय पर इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी नहीं किए। यदि समय रहते दिशा-निर्देश जारी किए जाते तो अधिकांश शिक्षक तैयारी कर टीईटी उत्तीर्ण कर सकते थे।

शिक्षक संघ ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त रखा जाए। साथ ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 23(2) में संशोधन कर पुराने शिक्षकों को राहत दी जाए। जब तक संशोधन नहीं होता, तब तक अध्यादेश लाकर उनकी सेवा और पदोन्नति सुरक्षित की जाए।

संघ ने कहा कि वर्तमान निर्णय से हजारों शिक्षकों और उनके परिवारों का भविष्य संकट में पड़ गया है। कई शिक्षक सेवानिवृत्ति के करीब हैं और अचानक नई पात्रता लागू किए जाने से वे मानसिक तनाव में हैं। शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया है, इसलिए सरकार को उनके अनुभव और सेवा को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

शिक्षक संघ ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर सकारात्मक पहल करेगी और देशभर के लाखों शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए उचित समाधान निकालेगी।

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