अल्मोड़ा में पुलिस के दोहरे मापदंडों पर उठे गंभीर सवाल
अल्मोड़ा। यदि कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने लगें तो आम जनता किससे उम्मीद करे? अल्मोड़ा में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों का पाठ पढ़ाने वाली पुलिस खुद उन्हीं नियमों को ताक पर रखकर घूम रही है।
शहर के प्रमुख मार्गों पर पुलिस द्वारा लगाए गए नो पार्किंग बोर्ड आज मजाक बनते दिखाई दे रहे हैं। वजह यह है कि जहां आम नागरिकों को वाहन खड़ा करने पर चालान और जुर्माने का सामना करना पड़ता है, वहीं कई स्थानों पर पुलिस के वाहन बेखौफ नो पार्किंग क्षेत्रों में खड़े दिखाई देते हैं।
यह स्थिति केवल नियम उल्लंघन तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासनिक नैतिकता पर भी सवाल खड़े करती है। जब जनता देखती है कि नियम बनाने और लागू करने वाले ही नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं तो कानून के प्रति उसका विश्वास कमजोर पड़ता है।

मालरोड और चौघानपाटा क्षेत्र में कई पुलिसकर्मी बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाते देखे जा सकते हैं। सड़क सुरक्षा अभियान के दौरान यही विभाग हेलमेट न पहनने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करता है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियम केवल आम नागरिकों के लिए बनाए गए हैं?
स्थानीय व्यापारियों और युवाओं का कहना है कि पुलिस का यह रवैया दोहरे मापदंडों को दर्शाता है। जनता से नियमों का पालन कराने से पहले विभाग को अपने कर्मचारियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाना चाहिए।
छात्रों ने आरोप लगाया है कि कई बार ट्रैफिक पुलिस स्कूल खुलने और छुट्टी के समय सड़क पर सक्रिय रहने के बजाय वाहनों में बैठकर मोबाइल चलाने में व्यस्त दिखाई देती है। इससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है और दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क सुरक्षा केवल दंडात्मक कार्रवाई से नहीं बल्कि व्यवहारिक उदाहरण से स्थापित होती है। यदि पुलिसकर्मी स्वयं नियमों का पालन करें तो जनता भी उन्हें गंभीरता से लेगी।
अब जरूरत इस बात की है कि वरिष्ठ अधिकारी मामले का संज्ञान लें और नियम तोड़ने वाले पुलिसकर्मियों पर भी वही कार्रवाई करें जो आम नागरिकों पर की जाती है। अन्यथा सड़क सुरक्षा अभियान केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएंगे और जनता का भरोसा लगातार कम होता जाएगा।
अल्मोड़ा की जनता अब यह जानना चाहती है कि कानून की किताब में पुलिस और आम नागरिकों के लिए अलग-अलग नियम लिखे गए हैं या फिर कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है।




