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संवाददाता
पृथ्वी दिवस 2026: “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” — ज्ञान, संकल्प और कार्रवाई का संगम
नई दिल्ली। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस), भारत सरकार द्वारा आज पृथ्वी भवन में ‘पृथ्वी दिवस 2026’ अत्यंत उत्साह और गंभीरता के साथ मनाया गया। इस वर्ष का मुख्य विषय “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” रहा, जिसने मानवता और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम में मंत्रालय के वैज्ञानिकों, वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिन्होंने सामूहिक रूप से ‘पृथ्वी दिवस संकल्प’ लेते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पद्म श्री सम्मानित, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉ. शैलेश नायक उपस्थित रहे, जो वर्तमान में ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज’ (एनआईएएस) के निदेशक हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता मंत्रालय के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने की। उनके साथ विशिष्ट अतिथियों में डॉ. मृत्युंजय महापात्र (महानिदेशक, भारतीय मौसम विभाग), एस. गोपाल कृष्ण (संयुक्त सचिव, एमओईएस) तथा डॉ. जगवीर सिंह (वैज्ञानिक ‘जी’) शामिल रहे।
ज्ञान: जलवायु लचीलेपन की आधारशिला
अपने मुख्य संबोधन में डॉ. शैलेश नायक ने मानव सभ्यता के विकास और जलवायु परिवर्तन के साथ उसके संबंधों पर एक गहन ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि मानव जाति ने पिछले दो लाख वर्षों में अनेक जलवायु परिवर्तनों का सामना करते हुए स्वयं को अनुकूलित किया है, तथापि पिछली एक शताब्दी में हुए परिवर्तन—विशेषकर वैश्विक तापमान में तीव्र वृद्धि—अभूतपूर्व और चिंताजनक हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आज के समय में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती केवल जलवायु परिवर्तन को समझना ही नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न जोखिमों और उनके बहुआयामी प्रभावों का गहन विश्लेषण करना भी है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य केवल ‘कैसे’ पर केंद्रित न होकर ‘क्यों’ और ‘इसके परिणाम क्या होंगे’ जैसे प्रश्नों के उत्तर खोजना होना चाहिए। भविष्य का निर्माण लचीलेपन के साथ-साथ न्यायसंगत दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए।”
डॉ. नायक ने कृषि क्षेत्र में संभावित परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए बताया कि वायुमंडल में बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर का प्रभाव विभिन्न फसलों पर अलग-अलग प्रकार से पड़ता है। सी3 फसलें—जैसे गेहूं और चावल—इससे अधिक प्रभावित होती हैं, जबकि सी4 फसलें—जैसे बाजरा—अपेक्षाकृत अधिक सहनशील होती हैं। इस संदर्भ में उन्होंने भारत सरकार की “मिशन मिलेट” पहल को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
जल सुरक्षा और जलवायु न्याय की चुनौती
जल संसाधनों पर चर्चा करते हुए डॉ. नायक ने चेतावनी दी कि भविष्य में जल की उपलब्धता का वितरण असंतुलित हो सकता है। उन्होंने बताया कि सिंधु नदी बेसिन में जल की मात्रा में संभावित वृद्धि हो सकती है, जबकि गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में कमी आने की आशंका है। इसका सीधा प्रभाव भारत के घनी आबादी वाले क्षेत्रों पर पड़ेगा, जिससे जल संकट और अधिक गहरा सकता है।
उन्होंने जलवायु न्याय की अवधारणा पर भी विशेष बल दिया। उनके अनुसार, भारत जैसे विकासशील देश, जहां प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अपेक्षाकृत कम है, फिर भी वैश्विक हरित पहल में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। यह वैश्विक असमानता को उजागर करता है, जहां कम योगदान देने वाले देश अधिक प्रभाव झेल रहे हैं।
“पृथ्वी की गर्मी”: संकट की गंभीर चेतावनी
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. एम. रविचंद्रन ने जलवायु परिवर्तन को अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली उदाहरण के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा, “जिस प्रकार मानव शरीर में कुछ डिग्री तापमान बढ़ने पर बुखार आ जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी का तापमान बढ़ना भी एक गंभीर चेतावनी है। आज पृथ्वी को ‘बुखार’ हो गया है, और इसके सबसे अधिक प्रभाव महासागरों तथा ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय में मानव गतिविधियां पृथ्वी की प्राकृतिक पुनरुत्पादन क्षमता से लगभग 1.8 गुना अधिक संसाधनों का उपभोग कर रही हैं। यह असंतुलन न केवल पर्यावरणीय संकट को जन्म दे रहा है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से मानव अस्तित्व के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रहा है।
डॉ. रविचंद्रन ने इस तथ्य पर गर्व व्यक्त किया कि भारत विश्व का एकमात्र देश है, जिसके पास ‘पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय’ जैसा समर्पित मंत्रालय है। यह मंत्रालय ‘डीप ओशन मिशन’, ‘मिशन मौसम’ तथा ‘PRITHVI’ जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से पृथ्वी और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
संकल्प से कार्रवाई की ओर
कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2026 के लिए निर्धारित ‘पृथ्वी दिवस’ गतिविधियों और जनजागरूकता अभियानों की विस्तृत प्रस्तुति भी दी गई। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पृथ्वी संरक्षण केवल एक दिन का विषय नहीं है, बल्कि यह एक सतत जिम्मेदारी है। “हर दिन पृथ्वी दिवस है”—इस संदेश के साथ सभी उपस्थित लोगों से आग्रह किया गया कि वे केवल जागरूकता तक सीमित न रहकर ठोस और व्यवहारिक कदम उठाएं।
इस अवसर पर उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों के सतत उपयोग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए व्यक्तिगत तथा संस्थागत स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
निष्कर्ष: भविष्य की दिशा
‘पृथ्वी दिवस 2026’ का यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी और प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आया। यह स्पष्ट संदेश देता है कि यदि मानवता को अपने भविष्य को सुरक्षित रखना है, तो उसे प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करना ही होगा।
ज्ञान, नीति और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही हम एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं, जो न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित हो, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी न्यायपूर्ण हो। पृथ्वी हमारी शक्ति है—और इसकी रक्षा करना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी।
